somnath sharma

मै एक इंच पीछे नहीं हटूंगा और तब तक लड़ता रहूँगा, जब तक कि मेरे पास आखिरी जवान और आखिरी गोली है :परमवीर मेजर सोमनाथ शर्मा

प्रथम परमवीरचक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा की स्मृति में

somnath shramबात पुरानी तो है, लेकिन इतनी भी पुरानी नहीं कि उसे भूला दिया जाये। बस अड़सठ साल पहले की ही तो बात है…आज ही का दिन, अड़सठ वर्ष पहले। पाकिस्तानी सेना और कबाईलियों की मिली-जुली पाँच सौ से भी ज्यादा फौज के खिलाफ़ वो अपने गिने-चुने पचपन जवानों के साथ भिड़ गये थे। वो थे सोमनाथ शर्मा- मेजर सोमनाथ शर्मा, भारत के सर्वोच्च वीरता-पुरूस्कार परमवीरचक्र के प्रथम विजेता।

सोच कर सिहर उठता हूँ कि उस रोज- उस 3 नवंबर 1947 को मेजर सोमनाथ शर्मा अगर अपनी बहादुर डॆल्टा कंपनी के पचास-एक जवानों के साथ श्रीनगर एयर-पोर्ट से सटे उस टीले पर वक्त से नहीं पहुँचे होते तो भारत का नक्शा कैसा होता…!

sharma26 अक्टूबर 1947 को जब बड़ी जद्दोजहद और लौह-पुरूष सरदार वल्लभ भाई पटेल के अथक प्रयासों के बाद आखिरकार कश्मीर के तात्कालिन शासक महाराज हरी सिंह ने प्रस्ताव पर दस्तखत किये तो भारतीय सेना की पहली टुकड़ी कश्मीर रवाना होने के लिये तैयार हुई। भारतीय सेना की दो इंफैन्ट्री बटालियन 4 कुमाऊँ और 1 सिख को इस पहली टुकड़ी के तौर पर चुना गया। 27 अक्टूबर 1947- जब भारतीय सेना की पहली टुकड़ी ने श्रीनगर हवाई-अड्डॆ पर लैंड किया, इतिहास ने खुद को एक नये तेवर में सजते देखा और इस तारीख को तब से ही भारतीय सेना में इंफैन्ट्री-दिवस के रूप में मनाया जाता है।

मेजर सोमनाथ शर्मा इसी कुमाऊँ रेजिमेंट की चौथी बटालियन की डेल्टा कंपनी के कंपनी-कमांडर थे |और उन दिनों अपना बाँया हाथ टूट जाने की वजह से हास्पिटल में भर्ती थे। जब उन्हें पता चला कि 4 कुमाऊँ युद्ध के लिये कश्मीर जा रही है, वो हास्पिटल से भाग कर एयरपोर्ट आ गये और शामिल हो गये अपनी जाँबाज डेल्टा कंपनी के साथ। नीचे की तस्वीर में आप देख सकते हैं मेजर सोमनाथ को हाथ में प्लास्टर लगाये:-

somnath sharmaउधर कबाईलियों का विशाल हुजूम कत्ले-आम मचाता हुआ बरामुला शहर तक पहुँच चुका था। उनकी बर्बरता की निशानियाँ और दर्द भरी कहानियाँ अभी भी इस शहर के गली-कुचों में देखी और सुनी जा सकती है। …और जब दुश्मनों की फौज को पता चला कि भारतीय सेना की अतिरिक्त टुकड़ियाँ भी श्रीनगर हवाई-अड्डे पर लैंड करने वाली है, तो वो बढ़ चले उसे कब्जाने। उस वक्त मेजर सोमनाथ अपनी डेल्टा कंपनी के साथ करीब ही युद्ध लड़ रहे थे जब उन्हें हुक्म मिला श्रीनगर हवाई-अड्डे की रखवाली का…और फिर इतिहास साक्षी बना शौर्य, पराक्रम और कुर्बानी की एक अभूतपूर्व मिसाल का जिसमें पचपन जांबाजों ने पाँच सौ से ऊपर दुश्मन की फौज को छः घंटे से तक रोके रखा जब तक कि अपने सेना की अतिरिक्त मदद पहुँच नहीं गयी। मेजर सोमनाथ के साथ 4 कुमाऊँ की वो डेल्टा-कंपनी पूरी-की-पूरी बलिदान हो गयी। मृत्यु से कुछ क्षणों पहले मेजर सोमनाथ द्वारा भेजा गया रेडियो पर संदेश:-

“I SHALL NOT WITHDRAW AN INCH BUT WILL FIGHT TO THE LAST MAN & LAST ROUND”{मै एक इंच पीछे नहीं हटूंगा और तब तक लड़ता रहूँगा, जब तक कि मेरे पास आखिरी जवान और आखिरी गोली है}

Param-vir-Chakraमेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरांत स्वतंत्र भारत के सर्वोच्च वीरता पुरुस्कार “परमवीर चक्र” से नवाजा गया और वो इस पुरुस्कार को पाने वाले प्रथम भारतीय बने। संयोग की बात देखिये 4 कुमाऊँ की इसी डेल्टा-कंपनी के संग युद्ध के दौरान शहीद हुये पाकिस्तानी सेना के कैप्टेन मोहम्मद सरवर को भी मरणोपरांत पाकिस्तान का सर्वोच्च वीरता पुरुस्कार “निशान-ए-हैदर” से सम्मानित किया गया था और वो भी इस पुरुस्कार को पाने वाले प्रथम पाकिस्तानी थे।

आप सब में से कोई अगर कुमाऊँ की पहाड़ियाँ नैनिताल आदि घूमने जायें, तो रानीखेत अवस्थित कुमाऊँ रेजिमेंट के म्यूजियम में अवश्य जाईयेगा…शौर्य की इस अनूठी दास्तान को करीब से देखने-जानने का मौका मिलेगा। जो लोग कश्मीर-वादी की सैर को हवाई-रास्ते से आते हों तो श्रीनगर एयरपोर्ट से बाहर निकलने के बाद तनिक ठिठक कर दो पल को हमारे हीरो मेजर सोमनाथ की प्रतिमा को सलाम जरूर दीजियेगा।…और जिन लोगों को कभी मौका मिले हमारे 4 कुमाऊँ के आफिसर्स-मेस में आने का,तो उन्हें दिखाऊँगा वो पहला परमवीर चक्र का असली पदक जो मेजर सोमनाथ के परिजनों ने हमारे मेस को सौंप दिया है श्रद्धापूर्वक।

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