Women's Day Special

महिला दिवस स्पेशल

महिला दिवस स्पेशल
8 मार्च सम्पूर्ण जगत में महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है। और ये मनाया भी जाना चाहिए क्योंकि आज तक जो महिलायें गुलामी और जिल्लत भरी जिंदगी जी रही थी ,जिनका घर से बहार निकालना भी मुश्किल था आज वो आसमान की बुलंदियों तक पहुंच चुकी है । आज उन्होंने पुरुषों को काफी पीछे छोड़ दिया है ।
लेकिन आज भी हमारे देश में कुछ जगह ऐसी हैं जहाँ नारी, हिंसा ,शारीरिक एवं मानसिक शोषण का शिकार हो रही है । आज माहिलायें कामकाजी हो गयी है ,लेकिन आज उनके इतने आगे जाने पर भी उनके अंदर एक डर है ,खौफ है ,की जो दिल्ली में हुआ ,जो गाज़ियाबाद में हुआ वो उनके साथ न हो ।

Women's Day Special
Women’s Day Special

हाँ आज महिलायें काफी उन्नति कर रही है उसके बावजूद आज भी कुछ नहीँ  बदला है पहले महिलायें अपने घर और समाज की बेड़ियों में बंधी रहती थी, तो आज दरिंदो मनचलो की चंगुल में । बदला  कुछ भी नहीं है ,कल भी हमारा ये समाज गूँगा ,बहरा और अंधा हुआ करता था और आज भी है । वो पुरानी मानसिकता अभी गयी नहीं है ।
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आज भी लोग अपनी बच्चियों को उनके भविष्य के लिए अपने से दूर नहीं भेज पाते है क्यों ?
क्योकि आज भी उन्हें डर है की कल जो दिल्ली में निर्भया के साथ हुआ वो हमारी बच्ची के साथ ना हो । आज हमारे इस आधुनिक समाज में महिलाओ का अस्तित्व तो है लेकिन आज भी वो बेड़ियों की गिरफ्त में है । परिवार के लिए समाज के लिए नारी सर्वश्रेष्ठ है उसके बावजूद आज नारियों का अस्तित्व संकट में है । और वो संकट और कुछ भी नहीं बल्कि महिलओं पर हो रहा जुल्म है ।

आज हम महिलाओं के उन्नति की मिशाल देते है ,प्रेरणाश्रोत बनाते है कभी मैरी कॉम ,तो कभी सानिया मिर्ज़ा ,कभी साइना नेहवाल ,तो कभी सिंधु ,प्रियंका चोपड़ा ,बचेंद्री पाल आदि आदि ।
न जाने कितनी महिलाओं के नाम गिनाते हैं, जिन्होंने देश का सर गर्व से ऊँचा किया हुआ हैं । पर उस प्रेरणा का मतलब ही क्या जब हमारी बच्चियां अपने ही घर और समाज में सुरक्षित नहीं है । महिलाओं के प्रति हिंसा की दर दिन प्रति दिन बढ़ ही रही है ,तो क्या ऐसे में हमें महिला दिवस मनाना चाहिए या फिर महिलाओं को एक स्वछ समाज प्रदान करना चाहिए?

आखिर कब तक हम अपनी इस तुच्छ क्षुधा और प्यास बुझाने के लिए महिलाओ की बलि चढ़ाते रहेंगे ? क्या ये अत्याचार बंद नहीं हो सकता ? पैदा होने से लेकर अब तक आखिर हम क्यों औरतों का खून पीते चले आ रहे है ?

हिमांशु मिश्रा