Ambassador summoned North Korea after the death of Kim Jong

 चुनावों में शिक्षा और रोजगार मुद्दा क्यों नहीं होता है क्या युवा वोट बैंक बस है ???

इलाहाबाद । 10 फीट ,20 फीट या पता नहीं और क्या इसे 70 साल में पाटा जा सकता था ?
शिक्षा देश और समाज की उन्नति का आईना हुआ करती है आजादी के लगभग सत्तर सालो के बाद आज हमारी आबादी साढे तीन गुना बढकर लगभग 130 करोड़ पहुंच चुकी है ।आज देश मे शिक्षको के लगभग छ: लाख पद रिक्त है ।सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत हर साल 27 हजार करोड़ रूपये खर्च करने के बावजूद लगभग 80 लाख बच्चे स्कूलो के दायरे से बाहर है ,लेकिन राजनैतिक दलो के समक्ष यह महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा नही है ।
Ambassador summoned North Korea after the death of Kim Jong
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अफसोसजनक है कि किसी भी राजनैतिक दल के लिये ध्वस्त शिक्षा व्यवस्था चर्चा का विषय नहीं है । प्राथमिक शिक्षा हो ,माध्यमिक हो या उच्च शिक्षा गुणवत्तापरक शिक्षा और रोजगारपरक शिक्षा महत्वपूर्ण चुनौती है । वंचित और निचले वर्ग के लोगों के लिये शिक्षा दूर की कौड़ी बनी हुई है ।चुनावो मे यह महत्वपूर्ण मुद्दा होना चाहिये लेकिन कोई भी राजनैतिक दल इस मुद्दे को नही उठा रहा है ।

विधायक और सांसद अपने क्षेत्रीय विकास कोष से प्राथमिक शिक्षा और गुणवत्तापरक शिक्षा के विकास पर कितना खर्च कर रहे हैं ,यह कोई नही बता रहा है ।दुर्भाग्यपूर्ण है कि कोई भी दल जनता और बच्चो के भविष्य से जुड़े इन विषयो पर चर्चा नही कर रहा है । एमएचआरडी की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में अभी भी रिक्त पड़े छ:लाख शिक्षको के पदों मे आधे से अधिक यूपी और बिहार में है ।
chunavo me shiksha aur rojgar mudda kyu nahi hota hai kya yuva vote bank bs hai ???
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आईआईएम ,केन्द्रीय विश्वविद्यालय समेत उच्च शिक्षण संस्थानो में करीब 30 फीसदी शिक्षको के पद खाली है ।साथ ही शोध की स्थिति काफी खराब है।गुणवत्तापूर्ण शिक्षा इस देश के समक्ष बड़ी चुनौती बना हूआ है ।कौशल विकास एक ऐसा मुद्दा है जिसमें भारत काफी पीछे है ।युवाओ की बढती हुई बेरोजगारी की फौज को कौशल विकास के जरिये कम किया जा सकता है .किन्तु किसी भी राजनैतिक पार्टी के लिये यह मुद्दा नही है ।

हमारे सरकारी स्कूलो का हाल किसी से छुपा नहीं है जो मीड डे मील और अपने शिक्षको की मोटी पगार के रूप मे किसी निजी स्कूल का तिगुना चौगुना खर्चा कर रहा है किन्तु गुणवत्तापरक और रोजगारपरक शिक्षा देने में पूर्णतया पंगु साबित हो रहे है ।कारण इनके जीर्ण शीर्ण भवन ,जो कभी भी गिर जाते हैं ,शिक्षकों का शिक्षा से ज्यादा केवल तनख्वाह में रूचि ,उनसे शिक्षण कार्य से ज्यादा गैर शैक्षणिक कार्य करवाना ।
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इसके अलावा अन्य विभागों की तरह शिक्षा विभाग का भ्रष्टाचार, कहीं मिड डे मील घोटाला तो कही पाठ्य पुस्तक और ड्रेस  घोटाला ,चारो तरफ भ्रष्टाचार का जाल फैला हुआ है ।

छह से 14 वर्ष तक के बच्चो के लिये शिक्षा के अधिकार (आरटीई) को लागू करने के बाद सर्व शिक्षा अभियान के तहत तीन वर्ष में 1.13 लाख करोड़ रूपये खर्च किये जा चुके है ,इसके बावजूद कमजोर वर्ग के बच्चो के लिये निजी स्कूलो मे 25 फीसदी सीट आरक्षित करना ,अशक्त  बच्चो को पढाई के अवसर देना ,शिक्षको के रिक्त पदो को भरना ,आधारभूत सुविधाओ को उपलब्ध कराने के साथ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जैसे विषय अभी भी चुनौती बने हुए है ।
वस्तुत: यदि सरकार को शिक्षा व्यवस्था मे समानता लानी है तो उसे सम्पूर्ण देश में एक समान पाठ्यक्रम लागू करना होगा ।बोर्ड माध्यम केन्द्रीय हो या राज्य स्तरीय इससे फर्क नही पड़ता किंतु पुस्तको के पाठ्यक्रम स्तर में बहुत अंतर नहीं होना चाहिये। इसमें स्थानीय स्तर पर कुछ पाठ अलग हो सकते हैं लेकिन ऐसा न हो कि पूरा का पूरा स्लेबस ही अलग हो ।
सरकारी विद्यालय में पढने वाले बच्चे का पाठ्यक्रम सीमित होता है और ये बच्चे कहीं से भी निजी स्कूलो के बच्चो से बौद्धिक क्षमता में कम नही होते है ।ऐसे में अनुभव यही बताता है कि पुस्तको के अतिरिक्त बोझ से दबे निजी स्कूलों के बच्चों को बचाने के लिये सरकार को सख्ती दिखाना चाहिये। दूसरी ओर निजी स्कूलो मे तमाम शिक्षणेतर गतिविधियां संचालित होती हैं ,जिनके नाम पर अभिभावकों से जमकर वसूली होती है ,इस पर भी अंकुश लगना चाहिये।
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यूं तो सभी सरकारें वर्तमान शिक्षा प्रणाली में आमूलचूल परिवर्तन करने की बात करती है ,किन्तु अगर आज हम अपने वर्तमान जो हमारे बच्चे हैं अगर इन्हे हम संभाल नही पाये ,इन्हे सही दिशा में नही ले जा पाये तो कल इनके जवान होने पर खुद स्वयं को और अपने देश को क्या भविष्य दे पाएंगे इस खयाल मात्र से डर लगता है ।

युवाओं का वोट सब पाना चाहते है लेकिन उनके लिये रोजगारपरक,गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात कोई नही कर रहा है ,युवाओ के कौशल विकास एवं उन्हे आत्मनिर्भर बनाने की बात कोई नही कर रहा है ।
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उन्हे नौकरियों में स्वस्थ एवं स्वच्छ प्रतिस्पर्धी माहौल देने की बजाए लैपटाप और स्मार्टफोन का लालीपाप देने का वादा किया जा रहा है ।चयन आयोगों में व्याप्त भ्रष्टाचार की जांच के बजाए बेरोजगारी भत्ता का झुनझुना थमाया जा रहा है । युवाओं को रोजगार एवं शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दो की अनदेखी ही हमारे समाज में अशिक्षा और असमानता की खाईं को और गहरा कर रही है ।जब तक राजनैतिक दल और सरकारें रोजगार और शिक्षा को अपनी प्राथमिकता में शामिल नहीं करेंगी तब तक हमारा समाज इसी प्रकार दो हिस्सों में बंटता रहेगा और अशिक्षा और असमानता की यह खांई और चौड़ी होती रहेगी ..।

गौरव सुशील पान्डेय के कलम से
(अध्यक्ष )
हितार्थ फाउंडेसन
8896689522

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