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आखिर कब बुझेगी तड़पते बुन्देलखन्ड की प्यास ??

बुंदेलखंड | जिंदगी की ओर ले जाने वाली आखिरी छलांग बड़ी कठिन होती है, जब घर में अन्न का एक भी दाना नहीं होता तब घबराकर सेमल की रूई की भांति गोते ही खाती रहती है जिंदगी ,यह सोच कर मौत को अलग-अलग ढंग से गले लगाने वाले निराशा के चलते विपत्ति से लड़ने की शक्ति हो चुके हैं ।

दुनिया में महिलाओ के लिये पति से ज्यादा महत्वपूर्ण शायद ही कोई वस्तु हो ,किन्तु बुन्देलखन्ड में एक लोकोक्ति है “गगरी न फूटै ,चाहे खसम मरि जाई ”
IMG-20170516-WA0044गर्मी अपने रौद्र रूप मे है ,बुन्देली धरती का एक बार फिर एक एक बूंद पानी के लिये तरसना शुरू हो गया है ।विकास के वटवृक्ष तले सूखते बुंदेलखंड के चित्रकूट घाट पर ना संतो की भीड़ है और न ही चंदन घिसने के लिए तुलसीदास  जी , बुंदेलखंड की व्यथा सुनने के लिए आज कोई तैयार नहीं है ।
विकास के नाम पर मिला पैकेज बंदरबांट का कारण बन गया है जिसके चलते रोज नए घोटाले प्रकाश में आ रहे हैं ,लेकिन दर्द के आंसू बुंदेली कहें तो किससे कहें ? फफक पड़ते बुंदेलखन्डियो के करुण क्रंदन के बीच कई कारुणिक कथाएं सुनाई देती रहती हैं सुनने वालों की आंखों के कोर भी गीले होते रहते हैं।

रो-रो कर अपना हाल बताने वाले में भूख और कर्ज से मरे हुए किसानों के परिजन भी हैं और पेंशन व राशन के लिए वर्षों से भटक रहे निराश्रित विधवाएं व वृद्ध भी है । रोजगार गारंटी योजना से धोखा खाए श्रमिक भी है तथा दबंगों और दलालों की लाठी बंदूकों के साए में जीने वाले कुछ जागरूक जन भी है और ऐसे युवक भी थे जिन्हें अपनी और अपने गरीब समुदाय के हक के लिए लिखा-पढ़ी करने के गुनाह में दबंग असरदारों ने पुलिस से सांठगांठ कर जेल भिजवाया है ।
बुंदेलखंड , योगी आदित्यनाथ , अखिलेश यादव , गरीबी , पानी , भुखमरी , यूपी सरकार , Bundelkhand, Yogi Adityanath, Akhilesh Yadav, poverty, water, hunger, UP governmentबुंदेलखंड के हर गांव की एक ही कहानी है । हर महीने कोई न कोई आपदा आती है ।कुछ किसान बगावत करते हैं तो कुछ आत्महत्या करते हैं लेकिन भूख के खिलाफ बगावत करने वाले को बागी कहा जाता है लेकिन इन बागियों के अतीत के उस कालिक में जीवन को जानने की किसी को फुर्सत नहीं । हताश ग्रामवासियों ने गरीबी से लड़ने कि अपनी इच्छाशक्ति खो दी है।
कवि अग्निवेद के शब्दों में

“बुंदेलखंड के सूखे खेतों को देखकर किसानों की छाती फट रही ,
अंधी प्रमाद ग्रस्त मदमस्त सत्ता जमीनी हकीकत नहीं स्वीकार रही, जब धरती पुत्रों के मुक्ति का मार्ग आत्महत्या बन जाए ,

पेट की आग में जलते जलते लोगों के जीवन भी बुझ जाए ,
राजधानी में फिजूलखर्ची पर बेशुमार दौलत फूंकी जाए
वीरभूम के वीरों की आंखें दो बूंद पानी को तरस जाएं
शोक या क्रोध में बुंदेल भूमि फट जाए,
लेकिन शर्मनाक चुप्पी को सद्बुद्धि कौन दिलाए “,

ये पंक्तियां बुंदेलखंड के भयावह हालात कीओर इंगित करती हैं।

वास्तव में देखा जाए तो आजादी के बाद से ही उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच बांटे गए बुंदेलखंड के साथ बड़ी नाइंसाफी हुई है ।खनन माफियाओं ने बुंदेलखंड के झांसी ललितपुर चित्रकूट हमीरपुर महोबा जालौन जनपद में खनिज संपदा का बेतरबीब ढंग से इतना अधिक दोहन किया है कि उसके कारण इस क्षेत्र में लगातार वर्षों से सूखा पड़ रहा है।

बुंदेलखंड वासियों के सामने जीवन मरण का सवाल खड़ा हो गया है। अतीत में चंदेलकालीन 6000 तालाबों और नदियों के कारण हरियाली से भरपूर रहने वाला यह क्षेत्र उजाड़ बनने को मजबूर है, आज जबकि इन चंदेल कालीन जलस्रोतों के संरक्षण की आवश्यकता है ,तब सरकारें JCB मशीन से खुदाई करवाके खानापूर्ति कर रही हैं ।
 बुंदेलखंड , योगी आदित्यनाथ , अखिलेश यादव , गरीबी , पानी , भुखमरी , यूपी सरकार , Bundelkhand, Yogi Adityanath, Akhilesh Yadav, poverty, water, hunger, UP governmentकेंद्रीय जल आयोग और जल संसाधन मंत्रालय का कहना है कि आने वाले समय में खेतों और लोगों के जीवन यापन के लिए पानी का संकट बढ़ सकता है ।भूगर्भ जल की कमी और असंतुलन के कारण ही धरती फटने जैसी घटनाएं हो रही हैं इस सदी के पहले दशक में बुंदेलखंड में धरती फटने की कुल 8 घटनाएं हुई हैं ।यह जानकर आश्चर्य होगा कि बुंदेलखंड में दिल्ली के बराबर ही बारिश होती है ,किंतु यहां की मिट्टी में ग्रेनाइट होने के कारण जल संचयन में कठिनाई होती है ।

फिर भी यदि बुंदेलखंड में ईमानदारी से जल प्रबंधन होता तो यह समस्या पैदा नहीं होती ।बुंदेलखंड में विकल्प बहुत है,बुंदेलखंड की पानी की समस्या हमारी खुद की पैदा की हुई है ।यहां बारिश के पानी के संचयन और जल प्रबंधन को लेकर गंभीरता से काम नहीं किया गया जिसका परिणाम सामने है ।

पिछले एक दशक में चित्रकूट मंडल के बांदा, महोबा हमीरपुर ,चित्रकूट जिलों में औसत वर्षा होती रही है लेकिन जरुरत के समय पर महीनों तक लगातार बारिश ना होने से फसलें सूख जाती है ।बेतवा ,केन ,धशान ,शहजाद, मंदाकिनी जैसी नदियों के होने के बावजूद सिंचाई के साधनों का समुचित विकास नहीं किया गया।

लेकिन पिछली एक शताब्दी के दौरान शोषण के गहरे कुचक्र के कारण यहां के निवासी अपनी ही जमीन पर बंधुआ मजदूर बनकर रह गये है ,उत्तर प्रदेश डेवलपमेन्ट कारपोरेशन के सर्वेक्षण मे बताया गया कि पाठा के 7336 अनूसूचित परिवारों मे से 2316 परिवार बंधुआ मजदूर थे ।
पूरे क्षेत्र मे डाकुओ के गिरोह भी काफी अरसे से सक्रिय है,जिससे चारो ओर आक्रोश फैला हुआ है ।
 बुंदेलखंड , योगी आदित्यनाथ , अखिलेश यादव , गरीबी , पानी , भुखमरी , यूपी सरकार , Bundelkhand, Yogi Adityanath, Akhilesh Yadav, poverty, water, hunger, UP governmentबुन्देली कवि आदीश के शब्दो में

“ये लो अपनी सोन चिरैया ,जा नई मोखों चाने,
पीने को पानी नईया ,खावे को नईया दाने ”

यहां आंकड़ों की बाजीगरी है। गरीबी भुखमरी तंगहाली जैसे हालात से जूझ रहे बुंदेलखंड में मनरेगा जैसी योजना धरती से ज्यादा कागजों पर चल रही है ।इसलिए गरीब रोजी रोटी की तलाश में रोज बिकने को मजबूर है ।बुंदेलखंड में विकास की गंगा बहाने के लिए सूखे तालाब को और नदियों को बचाने का संकल्प लेना पड़ेगा ।बुंदेलखंड वासी अपने परिवारों की भूख मिटाने के लिए वृद्ध मां-बाप के सहारे बच्चों को छोड़ कर अधिकांश लोग बाहर कमाने चले गए हैं ।बुंदेलखंड की आबादी 78 लाख है जिसमें से 30 लाख लोग पलायन कर गए हैं ।गांव में ताले लगे हैं ।

समाज सेवा की आड़ में अनेक स्वयंसेवी संस्थाएं बुंदेलखंड को चरागाह के रुप में इस्तेमाल कर रही हैं ,उन्हें क्षेत्र के गरीब और गरीबी से कोई मतलब नहीं है ।

खादी का कुर्ता और जींस पहनकर बुद्धिजीवी बने तथाकथित लोग पुरस्कार पाने की होड़ में सेवा का नाटक करते हुए करोड़ों रुपए का पुरस्कार हड़प रहे हैं ।इन स्वयंसेवी संस्थाओं ने इंसान सेवी संस्थाओं ने एक भी काम ऐसा नहीं किया है जिसका उल्लेख किया जा सके ।जो  फर्जी सेमिनार और गोष्ठियों का बिल बाउचर बनाकर मालामाल हो रहे हैं ।

बुंदेलियो के लिये अप्रैल से जून तक का समय अत्यंत कष्टकारी होता है ,खासतौर से महिलाओं को अत्यंत नरकीय स्थिति से गुजरना पड़ता है ।

सवाल है कि आजादी के सात दशक बाद भी सरकारें बुंदेलखंड की प्यास बुझाने में विफल क्यों रही हैं ??सरकारें आती-जाती रहती हैं बुंदेलखंड को तरबतर करने के नाम पर अरबों रुपए खर्च किए जा चुके हैं, फिर भी स्थिति जस की तस है बुंदेलखंड में दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण सरकारों ने कभी भी इस दिशा में ठोस काम ही नहीं किया ।

योजनाओं के नाम पर लाखों करोड़ों की व्यवस्था आसानी से हो जाती है  लेकिन बुंदेलखंड में इसका लाभ कहीं नहीं दिखता ।दरअसल न तो ठोस कार्य योजना बनी और न ही सही ढंग से काम हुआ ।नतीजा सूखा कंठ लिये बुंदेलखंड तड़प रहा है ।भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है ।लाखों लोग पलायन कर चुके है ।

वर्तमान सरकार ने बुन्देलखंड को अपनी प्राथमिकता बताया है ।उम्मीद तो यही है कि पिछली सरकारों और योजनाओं से सबक लेते हुए ठोस जमीनी स्तर पर कार्य किया जाएगा ।

गौरव कुमार पांडेय कलम से |

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