इतिहास के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश

इतिहास के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश

इतिहास यूं तो कहने-सुनने, पढ़ने-पढ़ाने का विषय है, किंतु जब वह कहने-सुनने, पढ़ने-पढ़ाने से निकलकर किसी समाज में तनाव और हिंसा का कारण बनने लगे तो सभी को चिंतित होना चाहिए। वस्तुत: इतिहास जब किताबों से बाहर निकलकर प्रदर्शन अथवा कर्मकांडीय आयोजनों का हिस्सा बन जाता है तो ज्यादा प्रभावी हो जाता है। इतिहास की घटनाएं जब वृतांतों से बाहर आकर स्मारकों, नाटकों, उपन्यासों,फिल्मों या फिर शौर्य दिवस जैसे आयोजनों का रूप ले लेती हैं तो वे दृश्यपरक होकर हमारी स्मृति का हिस्सा बनकर उन्हें बार-बार कुरेदने लगती हैं।

इतिहास के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश
                                                      इतिहास के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश

इतिहास के वृतांत जब सामाजिक एवं जातीय स्मृतियों का रूप ले लेते है तो वे जातीय गर्व का हिस्सा बन जाते हैं। जातियां उनके लिए मरने-मारने को तैयार हो जाती हैं। ऐसे में इतिहास तथ्यों पर आधारित आलोचनात्मक ज्ञान विमर्श से निकलकर ‘मिथक’ का रूप ले लेता है। इसे ‘मिथो हिस्ट्री’ यानी मिथकीय इतिहास कहा जाता है ।पद्मावती के ऐतिहासिक चरित्र के फिल्मीकरण को लेकर विवाद अभी पूरी तरह समाप्त भी नहीं हुआ था कि पुणे के पास भीमा-कोरेगांव में हिंसा भड़क उठी।

इस हिंसा के विरोध में महाराष्ट्र बंद के दौरान भी अनेक हिंसक घटनाएं हुईं। भीमा-कोरेगांव में विवाद एवं तनाव और फिर हिंसा का कारण बना दो सौ साल पहले हुए एक युद्ध का स्मरण। जब अंग्रेजों के खिलाफ देसी राजाओं का संघर्ष जारी था तब एक जनवरी, 1818 को अंग्रेजी सेना एवं पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना में संघर्ष हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजों की सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को परास्त कर दिया। अंग्रेजों ने इस जीत के उपलक्ष्य में भीमा-कोरेगांव में एक स्मारक स्थापित किया। कहते हैं कि अंग्रेजों की जिस सेना ने पेशवा बाजीराव द्वितीय को परास्त किया उसमें महार जाति के सैनिक ज्यादा थे। महाराष्ट्र के दलित विशेषकर महार इसे अपनी जीत मानते रहे है एवं प्रतिवर्ष एक जनवरी को भीमा-कोरेगांव में एकत्र होकर ‘शौर्य दिवस’एवं ‘गर्व दिवस’ मनाते हैं। इसके विपरीत गैर दलित मराठा और कुछ ओबीसी सामाजिक समूह इसे अपने लिए ‘शर्म’ की घटना मानते हैं, क्योंकि इस घटना के वृतांत में उनकी ‘पराजय की कथा’ है, जिसे वे कहने-सुनने एवं सेलिब्रेट करने के विरुद्ध हैं।

इतिहास के नाम पर ध्रुवीकरण की कोशिश
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इतिहास की एक ही घटना एक साथ दोहरा परिणाम दे सकती है। एक घटना विशेष जहां एक समुदाय के लिए ‘गर्व’ का विषय हो सकती है वहीं दूसरे समुदाय में ‘शर्म’ का भाव जगा सकती है। इतिहास जब अकादमिक ज्ञान से निकलकर ‘पब्लिक हिस्ट्री’ का रूप ले लेता है तो खतरे बढ़ जाते हैं। पब्लिक हिस्ट्री के रूप में इतिहास एक तरफ जहां हमें ‘गर्व’ एवं सामाजिक सशक्तीकरण प्रदान करने वाली शक्ति दिखता है वहीं दूसरी तरफ हम उसे अत्यंत बलहीन मानते हुए उसे बचाने के लिए मरने-मिटने को तैयार हो जाते हैं। आखिर जो इतिहास हमें शक्तिवान बनाता है वह इतना कमजोर कैसे हो सकता है कि यदि कोई उसकी आलोचना करे या उसका कोई और रूप सामने लाए तो हमें हिंसा का सहारा लेना पड़े । महाराष्ट्र की राजनीति में मराठा और दलित दो ऐसी शक्तियां हैं, जो संगठित भी हैं और शक्तिशाली भी।

मराठा शुरू से ही महाराष्ट्र की राजनीति का केंद्र बिंदु रहे हैं। मराठा और दलितों के दम पर ही राज्य में सत्ताओं का गठन और विघटन होता रहा है।मराठा समाज महाराष्ट्र का वृहत्तर कृषक समाज है और दलित समाज राज्य का मेहनतकश वर्ग है।महार आजादी के बाद की जनतांत्रिक नीतियों से लाभान्वित होकर बोलने एवं प्रतिरोध करने की क्षमता से लैस हो चुके है। यह समूह अब ‘मूक समुदाय’ नहीं रहा, जो अंबेडकर द्वारा कभी विमर्श में लाए गए ‘मूक भारत’का हिस्सा कहा जाता था। जाहिर है, वोटों के ध्रुवीकरण का प्रपंच दोनों ही तरफ से रचा जा रहा है। हालांकि राजनीतिक नफा-नुकसान की जोड़-तोड़ में भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आजादी के बाद से हमारा लंबा समय जातीय हिंसा को समाप्त करने, सामाजिक भेदभाव को मिटाने, अनेकता में एकता को पुष्ट करने, सांप्रदायिक सौहार्द को बनाए रखने की कवायद में खर्च हुआ है। तमाम नेताओं, समाज सुधारकों, विद्वानों, शिक्षाविदों, धर्म गुरुओं ने इसे राष्ट्रीय उत्थान के लिए अपना जीवन लगा दिया। इन सबकी मेहनत के साथ देश में संसाधनों की समृद्धता,

औद्योगिकीकरण,शहरीकरण, शिक्षा और रोजगार के अवसरों का विकास, संसाधनों की वृद्धि और तकनीक के समयबद्ध विकास के सहयोग से जातियता,सांप्रदायिकता, भेद-भाव, छूआछूत जैसी समस्याओं पर हमारा देश,हमारा समाज पिछले 60-70 साल में बहुत हद तक अंकुश लगाने में कामयाब हो चुका है। लेकिन एक वर्ग ऐसा भी है, जिसने कभी तुष्टिकरण कह कर, कभी छद्म निरपेक्षता कह कर, कभी अतिरंजित कथाओं के सहारे, कभी भड़काऊ तर्कों के सहारे इन उपलब्धियों को बौना साबित करने की सतत कोशिश की है। ये कोशिशें देश के सामाजिक ताने-बाने को ध्वस्त करने का सबब बन सकती हैं।

गौरव कुमार पांडेय के कलम से

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